Bookish Witch

Adhuri Khwahishein (Hinglish Edition) by Bhakti Motta

Book blurb:

Adhuri Khwahishein is a collection of poems that talk about unfulfilled desires, heart break, bridges burnt, self love, childhood, and so much more. Every poem in this collection will touch your heart. Some will make you sad, some will give you joy, but most importantly they will all give you hope. Individually they stand on their own, collectively they weave a story.

Genre: Fiction/Poetry

Language: Hindi

Pages: 44

Format: Kindle eBook

Price: 99 INR/$2.99

My Ratings: 4/5

An insightful ride of emotions and thoughts

Are you a lover of Hindi language? Do you like poetry? If yes, then you should definitely give this book a try. It covers a wide array of topics from love to relationships, to familial ties and societal expectations and experiences.

What I liked about the book:
—> The writing strikes an emotional chord with the reader.
—> Though written by a woman, it uses male narrative in many poems.
—> For someone who hasn’t read much of Hindi literature, this makes a good beginner’s book.
—> Some of my favourite titles include ‘मैं तेरी डोर तू मेरी पतंग’, ‘कोरा कोरा’, ‘लोग क्या कहेंगे’, ‘कभी कभी’, ‘अधूरी ख्वाहिशें’, ‘दो कदम’ and ‘खत’

What I did not like about the book:
—> A few poems felt dragged and dull.
—> I’m no expert in Hindi language and literature, but the language seemed a bit colloquial.

Quotable quotes:
—> हर ख्वाहिश जो पूरी हुई,
दो पल की खुशी दे गयी,
हर ख्वाहिश जो अधूरी रही,
जिंदगी भर का सबक सीखा गई ।
बस यही हैं इस जिंदगी का सार ।
—> यह दुनिया बहुत खूबसूरत हैं,
इसकी खूबसूरती मुझसे भी हैं ।
—> जो खो गया हैं, उसे ना तलाशो ।
जो मेरा हैं, मेरा रहेगा सदा, जिसे मिलना हैं,
वो खुद आकर होगा खड़ा ।
जो मेरा नहीं उसके आगे मिन्नतें क्या करना भला ?
—> जरा जरा कर यूँ ही जिंदगी बीत जाएगी,
जरा जरा कर खुशियों बतौर ले ए दिल,
जरा जरा कर ग़म यूँ ही कम होता जाएगा ।
—> कब तक अपने आप को दूसरों से कम बताओगे,
कभी तो अपने आप से प्यार जताओगे ।
—> शिकायत तो रोज करते हो,
कभी तो किसी का आभार मान लिया करो ।
—> भविष्य और भूतकाल के बारे में तो रोज सोचते हो,
कभी वर्तमान में जी लिया करो ।
—> इन्सान बन कर क्या पाया है मैंने ?
धर्म मजहब ने डर फैलाया हैं ,
मंदिर मस्जिद की लड़ाई में,
सिर्फ इन्सान ने इंसानियत को हराया हैं ।
—> क्यूँ हैं यह दुनिया सिर्फ कहती ?
क्यूँ हैं यह दुनिया सिर्फ कहती ?
क्यूँ नहीं यह दुनिया सुनती ?
क्यूँ नहीं देखती ?
मैं कितनी बार हूँ गिरती, फिर भी उठ खड़ी हो जाती
—> हम तो अकेलेपन मे भी मौज करते हैं,
तुम तो महफिलों मे भी अकेले हो,
कितने दिन दिल चुराओगे सवालों से,
कभी ना कभी जवाब तलाशोगे ।
—> जिंदगी तू बहती जाती नदी की तरह,
हर मोड़ पे मूड जाती लहरों की तरह ।
जिंदगी तू हैं उस मधुर गीत की तरह,
जिसे गुनगुनाती रहूँ मैं सदा ।
—> हर शाम क्रिकेट, और शटल कॉक का दंगल हुआ करता था,
पेप्सी चुस्की, और आम रस से यह गला कहाँ सूखा रहता था ।
चांदनी रातों में छत पे बच्चों का बसेरा हुआ करता था,
नानी की लोरी, लूडो, और सांप सीडी का डेरा लगा करता था ।

Buying details:

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